Bamboo(bans) ki kheti,बांस की खेती :आप कमा सकते हो लाखो रूपये,इस कहते है हरा सोना

नमस्कार दोस्तों आप सभीका हमारे लेख मे स्वागत है हम आपके लिए हररोज नई जानकारीं लेके आते रहते है हम सरकारी योजना और किसान क उपयोगी माहिती उसके आलावा खेती के लिए उत्तम जानकारी लेके आते रहते है आज हम आपके लिए आज बांस की खेती की जानकारी लेके आये है आज भारत में कृषि क्षेत्र से पैसा कमाने के लिए किसानों के पास कई विकल्प हैं। उन्नत प्रजातियों की खेती और नवीन तकनीक का उपयोग इन विकल्पों में शामिल हैं। कृषि में नई तकनीकें और उन्नत किस्मों का उपयोग करके किसान अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इन विकल्पों के बावजूद खेती-किसानी में लागत तो आती है। लेकिन सरकार भी किसानों पर खर्चों को कम करने के लिए भरपूर आर्थिक सहायता दे रही है। बांस की खेती (bans ki kheti) भी आर्थिक मदद वाली उन्नत किस्मों की खेती है। 

किसानों को बांस की खेती करने से अच्छा मुनाफा मिल सकता है। साथ ही, वे बांस (bamboo) का उत्पादन करके अधिक पैसे कमाएंगे। सरकार बांस की खेती (bans ki kheti) में किसानों को शुरुआती पौधरोपण की लागत कम करने में भी मदद करेगी। बांस की खेती (bamboo farming) इस तरह लाभदायक हो सकेगी।

बांस की खेती की खासियत

बांस (bamboo) प्रकृति का एक अद्भुत उपहार है। बांस, पौधे के रूप में, सबसे अधिक खपत होता है। भारत में बांस की करीब १३६ प्रजातियां हैं। बांस जंगल में सिर्फ प्रकृति की कृपा से खिलते हैं। जंगलों का अच्छा प्रबंधन और देखरेख नहीं होने से बांस की उपज बर्बाद होती रहती है। लेकिन आजकल बांस की खेती (bamboo farming) के बारे में अधिक लोग जानते हैं। बांस की खेती, या बांस की खेती, ग्रामीणों और आदिवासियों के जीवन को बेहतर बनाया है। सरकार ने कई राज्यों में बांस (bamboo) के कुटीर और लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की योजनाएं बनाई हैं। इन उद्योगों में बांस का प्रसंस्करण करके मकान निर्माण, हस्तशिल्प, टोकरियां, झूले, पंखे, सुगंधित अगरबत्ती और बहुत कुछ बनाया जाता है। बांस का प्रसंस्करण लोगों को काम और पैसे दोनों देता है। इससे ग्रामीण विकास में विशेष सहयोग मिल रहा है।

बांस की खेती (बांस की खेति) मे लागत और मुनाफा

बांस की खेती से बहुत पैसा मिल सकता है। क्योंकि बांस की खपत निरंतर बढ़ती जा रही है, जिससे किसान दोगुना मुनाफा कमा सकते हैं। 1500 पौधे प्रति हेक्टेयर जमीन पर 3 गुणा 2.5 मीटर की दर से रोपे जाएंगे। बांस को पौधों के बीच में खाली बचे स्थान पर भी लगा सकते हैं। बांस की खेती से हर चार वर्ष में 3 से 3.5 लाख रुपए का मुनाफा कमा सकते हैं। वहीं, 4×4 मीटर के मेड़ों पर दूसरी फसलों की खेती करने पर प्रति वर्ष लगभग 30 हजार रुपए की कमाई होगी। किसान खुद बांस की फसल लगाकर उसे प्रसंस्करण करे तो उनकी कमाई 3-5 गुना बढ़ जाएगी।

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बांस की खेती के अंदर सरकार की सहायता

केंद्र और राज्य सरकारों ने बांस की खेती (bans ki kheti) पर अधिक खर्च करने वाले किसानों को राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत पैसे देंगे। सरकार द्वारा बांस की खेती के लिए दी जाने वाली सहायता का पचास प्रतिशत किसानों द्वारा और पचास प्रतिशत सरकार द्वारा वहन किया जाएगा। 

उदाहरण के लिए, बांस का एक पौध 3 साल में औसतन 240 रुपए खर्च करता है। जिसमें सरकार 120 रुपये प्रति पौध देगी। सरकार द्वारा दिए गए पचास प्रतिशत अनुदान में से पचास प्रतिशत केंद्र सरकार और चालिस प्रतिशत राज्य सरकार लेंगे। किसानों पर पड़ने वाली लागत इस तरह काफी हद तक कम होगी ही। साथ ही, देश भर में बांस की खेती बढ़ेगी।

बांस की खेती क्यों करनी चाइये

किसान बांस की खेती करके ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बना सकते हैं। गांवों में आय बढ़ाने के साथ-साथ लोगों का पोषण भी बेहतर हो रहा है। 

आजकल बांस (bamboo) से बनाए गए उत्पादों ने बाजार में जगह बनाई है। बांस की खेती से लोग लकड़ी के उत्पादों पर अधिक आत्मनिर्भर हो रहे हैं। लकड़ी के उत्पादों को पहले से ही लोगों ने अपने दैनिक जीवन में उपयोग किया है। इसकी खपत बढ़ने पर जंगल नष्ट होने लगे और पेड़ों का कटाव तेजी से हुआ। बांस के प्रति जागरूकता बढ़ने लगी क्योंकि खेती में आधुनिक तकनीक और उन्नत बदलाव लागू होने लगे।

एक अध्ययन ने पाया कि पेड़ों से मिलने वाली लकड़ी बनाने में आठ दशक से भी अधिक समय लगता है। लेकिन 3-4 साल में बांस (bamboo) की पहली उपज तैयार हो जाती है। कटाई के बाद चार दशक तक फसल प्रबंधन से ही लाभ मिलता रहेगा। पशुओं को इसकी पत्तियां पोषण देंगी। एक हेक्टेयर में बांस की सहूलियत और किस्म के हिसाब से 1500 से 2500 पौधे लगाए जाते हैं। जहां बांस की खेती (bans ki kheti) से जंगलों को फिर से हरा-भरा होने का अवसर मिलता है वहीं, इससे बने उत्पादों का उपयोग करने से प्रकृति को बचाया जा सकता है।

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बांस की खेती मे ध्यान रखने की बाबते

किसानों के लिए बांस की खेती लाभदायक हो सकती है। लेकिन बांस की खेती करते समय धैर्य रखना बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि बांस रबी, खरीफ या जायद सीजन की खेती नहीं है फलने-फूलने में 3-4 साल लगते हैं। लेकिन पहली फसल के कटते ही किसान को बहुत पैसा मिलता है। बांस की खेती के साथ किसान चाहें तो अन्य फसलें भी लगा सकते हैं। बांस की खेती को दूसरी फसलों के साथ मिलाकर खेती करने से मिट्टी की उपजाऊ क्षमता भी बनी रहेगी। साथ ही, किसानों को दूसरी फसलों से समय पर अतिरिक्त आय भी मिलेगी।

मुनाफा करने के लिये बांस की खेती 

अब बांस भी कम मेहनत में अधिक मुनाफा देने वाली फसलों में शामिल हो चुका है। पुराने समय में बांस सिर्फ जंगलों में प्रकृति की कृपा से ही उगता था। लेकिन बांस का बढ़ता उपभोग इसकी व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देता है। बांस की खेती में बहुत मेहनत की आवश्यकता नहीं होती। यदि आप बांस की फसल को चार साल तक ठीक प्रकार से पालन पोषण करें, तो यह 40 से 45 साल तक आपको मुनाफा देती रहेगी। यह खेती के दौरान सबसे पहले नर्सरी तैयार की जाती है और पौध तैयार होने पर इसकी रोपाई की जाती है। इस बीच, किसान आर्थिक कठिनाई से जूझ रहे हैं तो सरकार से आर्थिक अनुदान भी ले सकते हैं। साथ ही बांस की फसल में कीट-रोग लगने की संभावना बहुत कम है। समय पर सिंचाई और निराई करते रहें। इन्हीं कृषि कार्यों से बांस की फसल और आपका मुनाफा दोनों बढ़ते रहेंगे।

राष्ट्रीय बांस मिशन (National Bamboo Mission)

राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत किसानों को बांस की खेती को बढ़ावा देने के लिए धन दिया जाता है। सरकार ने राष्ट्रीय बांस मिशन का शुभारंभ किया जिसका उद्देश्य सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय पैदा करना था। राष्ट्रीय बांस मिशन का लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में बांस की खेती और इसके प्रसंस्करण के लिए कुटीर और लघु उद्योगों को बढ़ावा देना है। इससे शहरी पलायन रुकेगा और भारत बांस उत्पादन में आत्मनिर्भर बन जाएगा। इस योजना के अंतर्गत किसानों को सरकारी नर्सरी से मुफ्त बांस की पौध मिलेगी।

राष्ट्रीय बांस मिशन भी किसानों को बांस की नर्सरी लगाने के लिए 120 रुपये प्रति पौध देगा। जिससे किसान बीज उत्पादन की शुरुआत कर सकें। केंद्र और राज्य सरकार राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत किसानों को धन देंगे। सरकार किसानों को दी जाने वाली सहायता राशि का पच्चीस प्रतिशत खर्च करेगी, जबकि बाकी पच्चीस प्रतिशत खुद सरकार खर्च करेगी। सरकार द्वारा प्रस्तावित पच्चीस प्रतिशत अनुदान में पचास प्रतिशत केंद्र सरकार और चालिस प्रतिशत राज्य सरकार देंगे। इससे किसान आसानी से बांस की खेती कर सकेंगे।  

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बांस की उन्नत किस्में (best bamboo for farming)

बांस की खेती करना सबसे महत्वपूर्ण है कि बांस की किस्मों का चुनाव किया जाए। 

भारत में बांस की कुल 136 किस्में हैं। जिनमें से सबसे अधिक लोकप्रिय प्रजातियां हैं, वे हैं बम्बूसा ऑरनदिनेसी, बम्बूसा पॉलीमोरफा, किमोनोबेम्बूसा फलकेटा, डेंड्रोकैलेमस स्ट्रीक्स, डेंड्रोकैलेमस हैमिलटन, मेलोकाना बेक्किफेरा, ऑकलेन्ड्रा ट्रावनकोरिका, ऑक्सीटिनेनथेरा एबीसिनिका, फाइलोंस्तेकिस बेम्बूसांइडिस और थाइरसोस्टेकिस ऑलीवेरी। इनकी खेती अंडमान निकोबार द्वीप समूह, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, जम्मू कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में होती है।

बांस की खेती के लिए जलवायु और मिट्टी

बांस की खेती करना चाहने वाले किसानों को पहले मिट्टी की जांच करनी चाहिए और अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करना चाहिए। बांस की उन किस्मों का चुनाव करें, जो आसानी से उपलब्ध हैं या अधिक लाभदायक हैं। बांस की खेती के लिए बलुई या दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है। मिट्टी का pH भी 6.5 से 7.5 होना चाहिए। बांस की नर्सरी आमतौर पर मार्च में तैयार की जाती है। 

यद्यपि, कुछ राज्यों में मानसून के दौरान जुलाई में भी बांस (bamboo) की खेती की जा सकती है। वर्तमान में बांस की खेती के लिए पूर्वोत्तर भारत और मध्य भारत की भूमि और जलवायु अनुकूल है।

बीजोपचार या बीज निकालना

बांस की बुवाई के लिए बीज प्राप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। बांस के फूल खिलने के बाद बीज मिलता है। इसके बावजूद, इस प्रक्रिया में कुछ समय लगता है। लेकिन बांस की बुवाई करके अच्छी फसल मिल सकती है। बांस से पके हुए बीज प्राप्त करने के लिए, बांस की फसल का झुंड़ बनाकर उन्हें एकत्रित करें और फसल की निचली जमीन से घास को साफ करें। अब बांस के झुंड से गिरने वाले बीजों को एकत्र करके किसी सुरक्षित स्थान पर रखें।

जानकारी के लिए बता दें कि बीज पकते समय फसल में चूहे और गिलहरियों का प्रकोप बढ़ जाता है। बांस की बीजों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें टिन के डब्बे में भरकर रखें। नर्सरी में बीजों को सीधे न बोएं; इसके बजाय, बीजों को शोधन करने से पहले बोएं। बीजों को सबसे पहले आठ घंटे तक पानी में भिगोएं। इस प्रक्रिया में पानी के नीचे स्वस्थ बीज बैठेंगे। पानी में तैरते बीजों को पहले निकालकर फेंक दें; उन्हें खेती में न प्रयोग करें। अब पानी के निचले हिस्से से प्राप्त स्वस्थ बीजों का बीज शोधन सुरक्षित रासायनिक दवाओं से करें। इससे फसल में कीट और रोग नहीं आएंगे।

बांस की खेती के लिए नर्सरी तैयार करे

बांस की खेती (bans ki kheti) में शुरुआती और महत्वपूर्ण कार्यों में से एक है नर्सरी तैयार करना। नर्सरी को तैयार करने के लिए पहले 12X15 मीटर की क्यारी बनाकर 30 सेमी तक गहरी खुदाई करें। सिंचाई करने के लिए सुविधाजनक छोटी क्यारियां बनाएं। अब गोबर की सड़ी हुई खाद क्यारियों में डालें। अब बांस के बीजों को नर्सरी में ठीक प्रकार से बो दें। बिजाई के बाद नर्सरी को भी हल्की सिंचाई दें। बोए गए बीजों में अंकुरण के लिए मिट्टी में नमी का होना स्पष्ट है। जहां बीजों का 10 दिन में अंकुरण होता है खेत में रोपाई के लिए प्रकंद भी अंकुरण के बीस से पंद्रह दिन बाद तैयार हो जाते हैं। प्रकंद थोड़ा मुड़ा हुआ होना चाहिए और 15 से 20 सेमी लंबा होना चाहिए। बांस के प्रकंद में कल्ले निकलने के बाद ही इसे खेतों में रोपना चाहिए।

बांस के प्रकंदों में कल्लों का विकास करने के लिए पॉलिथीन के थैलों में उन्हें डालें।

पॉलीथिन के थैलों में बांस की उपज को हल्की सिंचाई भी करें।

चूहे और गिलहरियों के आक्रमण से पौधशाला सुरक्षित रखें, जब कल्ले निकलते हैं। 

यह भी महत्वपूर्ण है कि बांस की रोपाई से पहले खेत या जमीन से जल निकासी की व्यवस्था कर लें, ताकि खेत में जल भराव न हो। 

अब जमीन पर खाद और उर्वरक डालें और कीटनाशक डालें। खेत को भी हल्की सिंचाई दें। 

अब पॉलीथिन से बांस की पौध निकालकर 5 X 5 मीटर की दूरी पर 0.3 X 0.3 X 0.3 मीटर के गड्ढों में डालें। 

रोपाई के बाद पौध में रोगों की निगरानी करें और समय पर सिंचाई और निराई करते रहें।

गुड़ाई और खपतवार नियंत्रण

बांस की फसल (bans ki fasal) में रोपाई करने के बाद कीटों और बीमारी का नियंत्रण करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए, रोपाई के एक साल तक फसल को देखते रहें। रोपाई के बाद हर महीने फसल को निराई भी करें। समय-समय पर निराई-गुड़ाई करना खरपतवारों को मार डालता है। वहीं, रोपाई के दूसरे वर्ष में पौधों के चारों ओर दो मीटर का घेरा बनाकर 15 से 30 सेमी की गहराई में गुड़ाई करें। लेकिन बांस की फसल में कीट या बीमारी नहीं होती। लेकिन कुछ जातियों को अच्छे प्रबंधन की सख्त आवश्यकता होती है। क्योंकि कवक रोग जैसे काला धब्बा कभी-कभी बांस के कल्लों को नुकसान पहुंचा सकता है। यह बांस की गुणवत्ता पर भी प्रभाव डाल सकता है।

बांस की खेती में उर्वरक और सिंचाई प्रबंधन

बांस की फसल को प्रसंस्करण में उपयोग करने के लिए 3 से 4 वर्ष का समय लगता है। इस किस्म का बांस आमतौर पर चौथे वर्ष में काटा जा सकता है। ध्यान रखें कि बांस की नर्सरी को सिंचाई मिलनी चाहिए। खेत के पास सिंचाई व्यवस्था के लिए ओवरहैड टैंक और तालाब भी बनावा सकते हैं। वहीं, बांस के खेत में खाद और पोषण प्रबंधन के लिए किसानों को अलग से पैसे नहीं देने चाहिए। बल्कि बांस की झड़ने वाली पत्तियां ही खाद बनती हैं। समय पर सिंचाई और पौधे के चारों ओर मिट्टी चढ़ाने से अच्छी उपज मिलेगी। इससे बांस की गुणवत्ता और स्वस्थ उत्पादन मिलेगा।

बांस की खेती मे उत्पादन

लकड़ी के स्थान पर बांस से बने उत्पादों को हर व्यक्ति ने अपनी जीवनशैली में शामिल करना शुरू कर दिया है। इससे मानव स्वास्थ्य बेहतर होगा और पर्यावरण संतुलित रहेगा। बांस पशुओं और इंसानों दोनों को एक संतुलित आहार देता है। पशुओं को पोषण देने के लिए हरे बांस को 3-4 महिने बाद ही काट दें। लेकिन रोपाई के 3 से 4 साल बाद फसल परिपक्व होने पर ही इसकी कटाई करें। परिपक्व बांस से बहुत कुछ बनाया जा सकता है, जैसे फर्नीचर, खिलौने, बोतल, टोकरी, सीढ़ी, टोकरी, चटाई टोकरी और बल्ली। आज बाजार में उपलब्ध सजावटी सामान से लेकर रसोई के सामान और कागज तक बांस से बनाया जाता है। कुछ राज्यों में बांस को घर की सजावट-बनावट से लेकर अचार बनाने तक में उपयोग किया जाता है।

सारांश

हमने दोस्तों आपको हमारे लेख के अंदर बताया है की आप बांस की खेती करके कैसे पैसे कमा सकते है वो सब जानकारी आपको दे रखी है तो आप इस लेख को ध्यान से पढ़े

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